हरिद्वार जिले की लक्सर विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सियासत इस समय नए राजनीतिक समीकरणों के बीच खड़ी दिखाई दे रही है। 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में बसपा ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिनमें लक्सर से मोहम्मद शहजाद ने 34,899 वोट (42.77 प्रतिशत) हासिल कर भाजपा के संजय गुप्ता को 10,440 मतों से हराया था। राज्य में बसपा की यह जीत पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी गई थी, लेकिन चार वर्ष बाद बदले राजनीतिक हालात में पार्टी के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बड़ी नजर आ रही है।
बसपा ने संगठन को मजबूत करने के लिए उत्तर प्रदेश के नेताओं पर भरोसा जताया है। प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी (बिजनौर), कार्यालय प्रभारी सूरजमल (मेरठ), प्रदेश प्रभारी दया चरण दिनकर (झांसी), मुनकाद अली (मेरठ), राजाराम (आजमगढ़), उमाशंकर (पीलीभीत) और जफर मलिक (हरदोई) सहित कई नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के इन नेताओं का संगठनात्मक अनुभव सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में मदद कर सकता है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में अंतिम फैसला स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और क्षेत्रीय मुद्दे ही तय करेंगे।
लक्सर विधानसभा की चुनावी तस्वीर इस बार पहले से अधिक जटिल मानी जा रही है। स्थानीय राजनीतिक आकलनों के अनुसार क्षेत्र में करीब 28 हजार मुस्लिम और लगभग 18 हजार दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। मुस्लिम मतदाताओं में अंसारी बिरादरी के करीब 8 हजार, तेली समाज के लगभग 12 हजार और झोंझा समाज के करीब 6 हजार वोट प्रभावशाली माने जाते हैं। यही सामाजिक समीकरण वर्षों से लक्सर की राजनीति का आधार रहे हैं। इस बार चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि बसपा के मौजूदा विधायक मोहम्मद शहजाद तेली समाज से आते हैं, जबकि आज़ाद समाज पार्टी से इकराम हसन के संभावित उम्मीदवार के रूप में सक्रिय होने से अंसारी बिरादरी के वोटों का एक हिस्सा उनके पक्ष में जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो बसपा के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं यदि दलित और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण अलग-अलग दलों की ओर होता है तो इसका सीधा असर बसपा की चुनावी स्थिति पर पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दलित समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी बसपा सुप्रीमो मायावती को अपना सबसे बड़ा नेता मानता है। हालांकि युवाओं के बीच आज़ाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद के प्रति बढ़ती राजनीतिक रुचि भी एक नया समीकरण बनाती दिखाई दे रही है। ऐसे में बसपा के सामने चुनौती सिर्फ विपक्षी दलों से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक दलित-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ को एकजुट बनाए रखने की भी होगी।
विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश से आए वरिष्ठ संगठनात्मक नेताओं की मौजूदगी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर सकती है, लेकिन हरिद्वार और विशेष रूप से लक्सर विधानसभा में चुनावी सफलता का आधार स्थानीय नेतृत्व, जनता से सीधा संवाद, क्षेत्रीय मुद्दों पर सक्रियता और उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता ही होगी। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बसपा 2022 जैसी सफलता दोहरा पाएगी, या बदलते सामाजिक समीकरण, नए राजनीतिक विकल्प और वोट बैंक में संभावित बदलाव पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी करेंगे। लक्सर की चुनावी तस्वीर आने वाले समय में न सिर्फ हरिद्वार, बल्कि पूरे उत्तराखंड में बसपा की राजनीतिक दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है।


