class="s-light site-s-light">

    लक्सर में गुर्जर चेहरे की जीत का इंतजार: क्या 2027 में टूटेगा 14 साल पुराना तिलिस्म ? - janwani express

लक्सर। उत्तराखंड की राजनीति में लक्सर विधानसभा सीट हमेशा से दिलचस्प चुनावी समीकरणों के लिए जानी जाती रही है। यहां जातीय समीकरण, मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका और स्थानीय बनाम बाहरी चेहरे का सवाल चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता रहा है। लेकिन इस सीट की राजनीति का एक बड़ा सवाल आज भी कायम है—2012 के परिसीमन के बाद आखिर कोई मजबूत गुर्जर चेहरा लक्सर विधानसभा की दहलीज क्यों नहीं पार कर पाया?

2007 में चैंपियन कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे और उनका प्रभाव और मजबूत दिखाई दिया। उन्हें 27,038 वोट मिले और उन्होंने बसपा के पाल सिंह कश्यप को 5,658 वोटों से हराया था। यानी 2002 और 2007 में लक्सर की राजनीति में गुर्जर नेतृत्व का प्रभाव साफ दिखाई देता है। लेकिन इसके बाद कहानी बदल गई।

2012 का परिसीमन बना सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट?

2012 के परिसीमन के बाद लक्सर और खानपुर के चुनावी भूगोल में बड़ा बदलाव आया। चैंपियन खानपुर विधानसभा की राजनीति में चले गए और लक्सर का चुनावी समीकरण नए सामाजिक समूहों और नए राजनीतिक चेहरों के इर्द-गिर्द घूमने लगा।

2012 में लक्सर से भाजपा के संजय गुप्ता ने 25,945 वोट लेकर जीत दर्ज की। इसके बाद 2017 में भी उन्होंने जीत दोहराई, लेकिन इस बार जीत का अंतर सिर्फ 1,604 वोट रहा। यहीं से लक्सर की राजनीति का एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आता है कि यहां किसी एक समाज का वोट बैंक अकेले जीत की गारंटी नहीं है।2017 का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण कुछ हजार वोट भी पूरा खेल बदल सकते है। 2017 में भाजपा के संजय गुप्ता को 25,248 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के हाजी तस्लीम अहमद को 23,644 और बसपा के सुभाष सिंह चौधरी को 19,656 वोट मिले। जीत का अंतर केवल 1,604 वोट रहा। यानी इस दौरान गुर्जर सारे सुभाष चौधरी को भले 19 हजार वोट मिले हो लेकिन पूरी ताकत के बावजूद जीत की दहलीज तक नहीं पहुंच पाए। लेकिन गुर्जर समाज के 9-11 हजार के संभावित प्रभावी वोटों की चर्चा राजनीतिक गलियारों में बार-बार होती है। हालांकि यह आंकड़ा किसी आधिकारिक चुनावी जनगणना के रूप में उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे राजनीतिक आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

2022 में बसपा के शहजाद ने पलट दिया पूरा चुनावी समीकरण

मो० शहजाद विधायक लक्सर

2022 में लक्सर ने एक बार फिर अपना अलग चुनावी मिजाज दिखाया। बसपा के मोहम्मद शहजाद ने 34,899 वोट लेकर जीत दर्ज की और भाजपा के संजय गुप्ता को 10,440 वोटों से हराया। यह नतीजा बताता है कि लक्सर में सिर्फ जातीय पहचान नहीं, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, सामाजिक समीकरण, पार्टी का आधार और विरोधी वोटों का बिखराव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

असली सवाल: आखिर गुर्जर चेहरा लक्सर की राजनैती में क्यों नहीं है कामयाब?

गुर्जर समाज का वोट चुनाव प्रभावी हो सकता है, लेकिन उसे एकमुश्त वोट में बदलना आसान नहीं है। इसके पीछे कई कारण दिखाई देते हैं।

01
पहला कारण
गुर्जर समाज का पूरा वोट किसी एक उम्मीदवार के पीछे एकजुट होकर जाना मुश्किल रहा है।
02
दूसरा कारण
लक्सर में मुस्लिम, दलित, सैनी, कश्यप, गुर्जर और अन्य ग्रामीण समुदायों के वोट चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालते हैं।
इसलिए केवल गुर्जर वोटों के सहारे विधानसभा चुनाव जीतना आसान नहीं माना जा सकता।
03
तीसरा कारण
पार्टी का टिकट सबसे बड़ा फैक्टर है। अगर गुर्जर प्रत्याशी को किसी बड़े राजनीतिक दल का मजबूत संगठन और समर्थन मिल जाए, तो लक्सर के चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसका बड़ा उदाहरण 2017 के विधानसभा चुनाव में जब सुभाष चौधरी को बसपा से टिकट मिला था तो 19656 वोट मिले थे।
लेकिन निर्दलीय या कमजोर संगठन के साथ वही सामाजिक समर्थन सीट की जीत में बदलना मुश्किल हो जाता है।
04
चौथा कारण
2012 के बाद लक्सर की राजनीति में प्रणव सिंह चैंपियन जैसी व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ वाला कोई मजबूत गुर्जर चेहरा सामने नहीं आया।
यही वजह रही कि गुर्जर वोटों की ताकत किसी एक चेहरे के पीछे पूरी तरह संगठित होकर जीत में तब्दील नहीं हो सकी।

अब 2027 में प्रमोद खारी व अवतार सिंह भड़ाना क्यों चर्चा में?

2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर लक्सर की सियासत में प्रमोद खारी और अवतार सिंह भड़ाना के नाम चर्चा में हैं। दोनों के नाम सामने आने से गुर्जर समाज के साथ-साथ दूसरे राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। प्रमोद खारी लंबे समय से लक्सर की राजनीति में सक्रिय हैं और गुर्जर समाज में उनकी राजनीतिक पहचान है। 2022 में भी समाज के एक वर्ग ने कांग्रेस से उन्हें टिकट देने की मांग की थी, लेकिन टिकट नहीं मिलने से समर्थकों में नाराजगी देखने को मिली थी।

अब जुलाई 2026 में भाजपा से इस्तीफा देने के बाद प्रमोद खारी ने लक्सर से विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में 2027 में उनकी दावेदारी को केवल टिकट की लड़ाई नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है।

दूसरी ओर हरियाणा के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना का नाम भी लक्सर की सियासत में चर्चा में है। 2024 में लक्सर में उनके कार्यक्रम के बाद चुनाव लड़ने की चर्चाएं उठी थीं। हालांकि उस समय उन्होंने लक्सर से चुनाव लड़ने से इनकार किया था। लेकिन अप्रैल 2026 में भड़ाना ने एक बार फिर लक्सर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि अगर किसी राजनीतिक दल से मौका मिलता है तो वह लक्सर से चुनाव लड़ सकते हैं।

यही वजह है कि 2027 का चुनाव अब और दिलचस्प नजर आने लगा है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गुर्जर समाज का कौन सा चेहरा मैदान में आएगा, बल्कि यह भी है कि गुर्जर वोट किसके पक्ष में एकजुट होंगे।

अगर प्रमोद खारी और अवतार सिंह भड़ाना दोनों मैदान में उतरते हैं तो गुर्जर वोटों के बंटवारे का सवाल भी खड़ा होगा। वहीं इनमें से किसी एक को बड़े राजनीतिक दल का समर्थन मिलता है तो मुकाबले का पूरा गणित बदल सकता है।

क्या लक्सर एक बार फिर किसी गुर्जर चेहरे को विधानसभा भेजेगा? या फिर गुर्जर वोटों की आपसी खींचतान, बहुकोणीय मुकाबला और दूसरे सामाजिक समीकरण एक बार फिर इस समाज के विधायक बनने की राह रोक देंगे?

फिलहाल इतना तय है कि 2027 में लक्सर की लड़ाई सिर्फ भाजपा बनाम बसपा या एक प्रत्याशी बनाम दूसरे प्रत्याशी की नहीं होगी। असली मुकाबला होगा—सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत पकड़, संगठन और वोट ट्रांसफर के उस गणित का, जो लक्सर में हर चुनाव के साथ नई कहानी लिखता है।

Share.

गुलशन आजाद, एक युवा पत्रकार है। जो अपराध एवं राजनितिक समेत समायिकी मुद्दो पर बिट करते है, पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता क्षेत्र में अपने योगदान से समाज को जागरूक करने में सक्रिय रहे हैं।

Contact is protected!

Exit mobile version